कजरी

बदरी आवऽ हमरी नगरी, नजरी डगरी ताकति बा।

सूखल पनघट, पोखर, कुइयाँ
असरा गिरल चिताने भुइयाँ
छलके नाहीं जल से गगरी, नजरी डगरी ताकति बा।

बूढ़ लगे सब बिरिछ पात बिन
ठठरी सेवे दिनवाँ गिन-गिन
अइतू फिनु बन्हि जाइत पगरी, नजरी डगरी ताकति बा।

धरती के कोरा अँचरा में
डालि खोंइछ बइठा पँजरा में
भरितू मांग पिन्हइतू मुनरी, नजरी डगरी ताकति बा।

छमछम छागल आजु बजावत
पुरुआ के संग नाचत गावत
आवऽ, तनि जा हरिअर चदरी, नजरी डगरी ताकति बा।

  • संगीत सुभाष,
    मुसहरी, गोपालगंज।

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