एहि मटिये के नगद-उधार सखिया

बाटे माटी मुर्दार-जियतार सखिया
एहि मटिये के नगद-उधार सखिया।

मटिये में जमलीं आ मटिये में मिललीं
मटिये के माल-असबाब हम रहलीं
फेंके मटिये के चार गो कँहार सखिया ।

सँचि-सँचि सीत-घाम बरखा देखाइ के
के राखे हमके गलाइ के सुखाइ के
जइसे डाले कोहड़उरी- अचार सखिया ।

कहे भर अनुमति गाइ-गूइ चल दीं
गीत गीतमलवा में एकठे पिरोइ दीं
अउर कुछ नाही बस-अख्तियार सखिया ।

कइसे कहीं कहहूँ न देत बाटे जिनगी
मउअतो से ढेर ई कड़ेर काटे जिनगी
नाहीं जिनगी के कवनो एतबार सखिया ।

  • आनन्द संधिदूत

Related posts

Leave a Comment