ई कवनो मुवे के उमिर रहे

एह घरी तहार आँखि शमसान लेखा हो गइल बा

भकसावन,सून आ चिता के भसम नीयर मटमइल उज्जर

तहार मुसुकी पहिले लेखा नइखे रिझावत

रोवला का पहिले लोर भरल आँखि तोपला के कला के माहिर भर बा

सुनाs!! जेकरा के तोपि के राखल चाहतानी नु

ओह घाव के जामल लोहू के रंग के तहार माई  जानतानी

जानला के परयास में अउंजा के का करबू

मरजाद के चउकठ पर बलि देत बेरा तहरा बाबूजी के हांथ काहें ना कांपेला।

मूवे के कहतारू, त मू जा

तहरा नाँव पर रोवे खाति अइहें मरजाद आ सहानभूति

छाती पीटी लो, बिलखी लो आ चिचिआई

हाय! अबहिन त कुल्हि एकइस बरीस के रहे

नवही मासूम आ अल्हड़ बहुरिया

जेकरा कुछे महिना पहिला सजा-सँवार के आ दान-दहेज देके बिदा कइल गइल रहे

कुछ दिन ओह सजला-संवरला के लाज राखल चाहत रहे

बाबूजी के जोगावल पूँजी तहरा संगे गइल रहे

कुछ दिन त ओहनी के अपना दानवीरता के सुख लेवे दीहल चाहत रहे

मरलू कि कुल्हि नास दीहलू

मू गइल

ई कवनो मुवे के उमिर रहे लइकी !!

 

मूल-रचना (हिन्दी) : डॉ सुमन सिंह

भोजपुरी भावानुवाद : जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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