अन्हरा बिना रहियो न जाय

” राउर मती मारल गइल बा ए अम्मा जी कि अइसन अछरंग बाबू जी प लगावत हईं।बतायीं इहो कवनो उमर-समय ह ई कुल करे क ?” अम्मा जी के चारो ओरी ले डाँट -फटकार पड़त रहे बाकिर ऊ मानत ना रहलीं एक्के बतिया फेंटे कि बुढ़वा कमकरिनिया से फँसल ह।पहिले-पहिल इ भेद ऊ अपने बिटिया से कहलीं अउर धिरवलीं कि केहू से कहिहा जन।बिटिया त केहू से ना कहलीं बाकिर बूढ़ा अपनहीं सबसे कह घललीं।गाँव भर में ई बात फइल गइल कि बाबू साहब कमकरिन से फँसल हउवन।जे सुने उहे हँसे अउर कमकरिनिया के देख के लिहाड़ी ले।कमरिनिया जब जनलस त मारे खुनुस के धउरल बाबू साहब के अँगने पहुँच के अम्मा जी के सुना-सुना के गरजे-तड़पे लगल-

” का जी अम्मा जी, रउआ घरे मेहनत-मजूरी करत हमनी क बूढ़ा गइलीं जा।राउरे दिहल फाटल-पुरान पहिरत, नून -रोटी खात लइका-लइकी पोसा-पला गइलन।सबकर सादी-बिआह कई भइलीं, नाती-पोता खेलावत हईं।अब एह उमिर में हमके रउआ अइसन अछरंग लगाइब हम सपनो में ना सोचले रहलीं ह।” कमकरिन हाँफ़त जाँय अउर बोलत जाय।

“हमरे आगे ई कुल नटबिरदा करबू त झोंटा कबार के मारब।आन्हर ना हईं हम कि हमके कुछ ना देखाला।चल जो इँहा से नाही त एहि चुल्हिया में झंउस देब।बेहया कहीं क कुल करम कइके इँहा सती-साबित्री बने आईल हईं।” अम्मा जी एकदम जरती आग भइल रहलीं।ओ घरी केहूवे के झँउस-झोकार सकत रहलीं।

“जात हईं ए अम्मा जी बाकिर आज के बाद एह दुआर पर लात ना धरब।” रोअत-सिसकत कमकरिन चलल जायं अउर अम्मा जी के दुआर ओरी हाथ हिला-हिला के हिकभर गरिअवतो जाय। जेही सुने उहे हँसे अउर कमकरिन के दुलरावे-

“एहि से कहाला कि एक्के दरी गोड़ तोड़ के ना रहे के चाहीं।अरे तोहके काम क अकाज ह, जहवाँ चहबू उहवाँ काम मिली।तोहरे नियन करतबी-सहूरदार खोजले ना मिली।ऊ बुढ़िया क दिमाग खराब रहल ह कि तोहरे नियन अदिमि-जन के अइसन अछरंग लगा के भगा देहलस हे।”

कमकरिन के जाते घर में हड़कंप मच गइल।पतोह कुल अम्मा के हूंसे लगलीं सन-

“काहें अपने गोड़ पर आरी मार लेहलीं अम्मा जी।जनते न हईं आजु काल्ह केहू के काम करे वाला नइखन मिलत।हमहन क दस गो लालच धरा के त इहाँ शहर में दाई – नोकर रखले हईं जा।रउआ लोग के अकेलहीं उहाँ रहे के बा त तनी टेढ़-सोझ त सहहीं के पड़ी न।” अम्मा जी के अब सबही लगे समझावे।लइका-पतोह,बेटी-दमाद जेही के फोन करें दुःख-सुख बतिआवे खातिर, उहे उनके चार बात सुनावे कि काँहे कमकरिनिया के भगा देलू ह।एक त ऊ अपने दुःख में दुखी रहलीं अउर दोसरे उनके सबकर उघटा-पुराण ना सह जाय।अम्मा अब केहू के फोन ना करें, केहू करबो करे त बतियावल ना चाहें।बुढ़ऊ से भी बोली-चाली बंद हो गइल रहे बाकिर उनुके देखभाल में कवनों कमी ना होवे दें ।खाना बना के जब परोस लें तब कहें-

” इहाँ खाना लग गइल ह।जेके भूख होखे ऊ आके खाये।” जब देर हो जाय माछी हाँकत अउर बुढ़ऊ ना आवें त खिसिया जाँय-

” सब गूंग-बहीर हो गयल ह का।कब ले एह उमिर में चूल्ह अगोरीं हो सत्ती माई।हे राम जी! हमके बोला लेता अपने लगे त ई निस्तनिया क मुँह छूटत।” बूढ़ा बुदबुदा के गरिआवें बाकिर बुढ़ऊ सुन लें अउर बूढ़ा क आकी-बाकी पूरा करत पीढ़ा प आके बइठ जाँय।

“घीव-गुर देंहीं ?” बूढ़ा देवार ओरी ताकत पूछें।

“नाही,हमके जहर-माहुर दे दा । खा के मू जायीं त तोहार पिंड छूटे।” हाथ क कौर पटकत बुढ़ऊ खुनुसा जाँय।

“हम काहें के जहर-माहुर देहीं।जाके माँग आवा ओही खनगिन से,जेसे मुंह में मुंह सटा के बतिआवेला।” बूढ़ा छन भर में चंडी बन गइल रहलीं।

” तू एकदम से सनक गयल हऊ।कह देत हईं इकुल कहले से बाज आवा नाही त साँचो जहर-माहुर खा के जान दे देब।मजे में रहिहा…।” क्रोध में हाँफ़त-बोलत बुढ़ऊ क कवर अँटक गइल।खाँसत-खाँसत लगे कि उनुकर परान छूट जाई।बूढ़ा पानी क गिलास लेके कब्बो बुढ़ऊ के पानी पिआवें ,कब्बो पीठ थपथपावें।कुछ देर के बाद जब बुढ़ऊ क खाँसी रुकल त बूढ़ा के जान में जान आइल।

“ए जी! हम रउआ के कहाँ दोस देत हईं। मरद-मानुस के कवन दोस जब मउगीए बेस्सा जस लाज -सरम तियाग घुम्मे लगिहन स त।कुल दोस ओही खनगिन क ह।कइसे भइया जी,भइया जी कइले कपार पर चढ़ल आवे ले।बेहया कहीं क।” बूढ़ा मनावन करे लगलीं।

“कुल दोस तोहरे दिमाग क ह।अपने उमर-समय क तोहके कवनो लाज-लिहाज ना ह।हमके केहरो क छोड़ले नइखू।लइका-पतोह, लइकी-फइकी,हीत-नात सबके कह आइल हऊ कि हम पातकी हईं।बतावा इहे कुल देखे के लिखल ह अब।” बुढ़ऊ के आँखी से आँस झरे लगल।ऐसे पहिले बूढ़ा कब्बो उनुके रोअत ना देखले रहलीं।बूढ़ा अपने गलती पर पछताए लगलीं।बुढ़ऊ के रोअत देख लागे कि उनकर करेजा फाट जाई।लाजन मूड़ी गोतले कहलीं-

“ए जी त रउवे न बोरी-बोरी अनाज उठा के दे देत रहलीं ह।रुपिया-पइसा जब मांगी तब ओके फट से निकाल के दे देब अउरी हमरे बेरी इक्को नया ना रही रउआ लग्गे।एक्को बेरी हमसे पूछत-जांचत रहली हँ का कि, ए हो पिंकिया के माई! लइकी के तीज-खिचड़ी भेजे के रहत होई त तोहूँ के कुछ पइसा-रुपिया चाही की ना ?” बूढ़ा सिसके लगलीं।

“तोहूँ अनेत बतिआवेलू भाई। घर क तू मलकिन हऊ।कुल्ह तोहरे ह जेके ला-दा।हम पूछे जाइला का कि केके का देत हऊ ?।”

“ऊ त हईये ह बाकिर कब्बो कहबो त ना कइलीं रउआ कि हई ला लइका-लइकिन के हाथ प ध दा।” बूढ़ा आपन पलरा झुक्के ना दें।

” ए भाई हमार कपार मत खा।तोहके जवन करे क ह करा।बाकिर आज के बाद कवनो मेहरारू ए दुआर पर लउक जइहन कि ना त एहि डंडा से मार के टंगरी तोड़ देब।जान जा।” बूढ़ा महीना भर से झाड़ू-बरतन करत थाक गइल रहलीं।बुढ़ऊ क ई प्रतिग्या सुन के उनके गस्ती आवे लागल।

“अरे नाही सब केहू थोरी बेहया होला।जायीं तनी गोइड़ाने कुसुमी के माई के बोला ले आयीं। बड़ा न नीक सुभाव क हे। कामो-धंधा में छरफर हे।”

बूढ़ा बुढ़ऊ क मनावन करे लगल रहलीं अउर बुढ़ऊ खुनुसन कब्बो लाठी पटकें कब्बो बूढ़ा के अंड-बंड बोलें बाकिर साँझ होत-होत गोइड़ान ओरी कुसुमी के माई के बोलावे चल दिहलन।

 

सुमन सिंह

(वाराणसी)

 

 

 

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