अइहें नू चान

कब अइहें अटरिया प चान
कि मनवाँ झवान हो गइल।

अँगना में आस के बिरवा लगवलीं।
कतिने ना लोभ-मोह जुगत जुगवलीं।
पसरल हजारन बितान,
त छतियो उतान हो गइल।

पारि रेघारी रचेलीं असमनवाँ,
खँचियन जोन्ही आँकीं, सीतल पवनवाँ,
अगनित सपन उड़ान,
सभनि के जुटान हो गइल।

घरियो भ चुरुआ में सुख का समाला?
जतिने समेटीं तले गरि-गरि जाला।
भइल ह मन हलकान,
सँचलको जिआन हो गइल।

कारी अन्हियरिया के अनगुढ़ बतिया।
रहता अजानल ह पगे-पगे घतिया।
साँसत में परल परान,
जिनिगिया धसान हो गइल।

कब अइहें अटरिया प चान
कि मनवाँ झवान हो गइल।

(शब्दार्थ – झवान- झाँवर, मुरझल। बिरवा- पौध। उतान- ऊपर का ओरि। रेघारी – लकीर। खँचियन – खाँची, टोकरी के बहुबचन। जोन्हीं- तारा। चुरुआ – अँजुरी।)

दिनेश पाण्डेय
पटना।

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